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Poem on nature in hindi | प्रकति पर कविताएँ

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Hindi Poems on Nature

अपने इस आर्टिकल में हम आज hindi poem on nature लेकर आए हैं| अपने इस आर्टिकल में हमने हिंदी की सुंदर-सुंदर प्रकृति पर आधारित कविताओं का संकलन प्रस्तुत किया है जो कि छोटे और बड़े सभी के लिए समान रूप से सहायक होगी| इन सुंदर-सुंदर कविताओं को पढ़कर प्रकृति से अपना एक सुंदर संबंध स्थापित करने का प्रयास कीजिए क्योंकि यह प्रकृति हमारी मूलभूत आवश्यकता है|

Poem on nature in hindi | प्रकति पर कविताएँ

पीपल

कानन का यह तरूवर पीपल।
युग युग से जग में अचल,अटल।।

ऊपर विस्तृत,नभ नील,नील
नीचे वसुधा में नदी,झील।
जामुन,तमाल,इमली,करील
जल से ऊपर उठता मृणाल
फुनगी पर खिलता खिलता कमल लाल।
तिर तिर करते क्रीड़ा मराल।।

ऊँचे टीले से वसुधा पर
झरती है निर्झरणी झर झर ।
हो जाती बूँद बूँद झर कर।
निर्झर के पास खड़ा पीपल
सुनता रहता कलकल-छल छल।।
पल्लव हिलते ढलढल-ढलढल,

पीपल के पत्ते गोल गोल।
कुछ कहते रहते डोल डोल।।

अ जब जब आता पंछी तरू पर
जब जब जाता पंछी उड़ कर
जब जब खाता फल चुन चुन कर,
पड़ती जब पावस की फुहार
बजते जब पंछी के सितार।
बहने लगती शीतल बयार।।

तब तब कोमल पल्लव हिल डुल
गाते सर्सर,मर्मर मंजुल।
लख लख सुन सुन
विह्वहल बुल बुल।
बुलबुल गाती रहती चह चह
सरिता गाती रहती बह बह।।
पत्ते हिलते रहते रह रह।

जितने भी हैं इसमें कोटर
सब पंछी गिलहरियों के घर।।
संध्या को अब दिन जाता ढल
सूरज चलतें हैं अस्ताचल,
कर में समेंट किरणें उज्ज्वल ।।

हो जाता है सुनसान लोक
चल पड़ते घर को चील,कोक।
अंधियाली संध्या को विलोक।
भर जाता है कोटर कोटर
बस जातें हैं पत्तों के घर।
घर घर मेंआती नींद उतर,

निद्रा ही में होता प्रभात
कट जाती है इस तरह रात।
फिर यही बात रे वही बात,
इस वसुधा का यह वन्य प्रान्त,
है दूर, अलग अक्रान्त शान्त।

है खड़े जहाँ पर शाल,बाँस
चौपाये चरते नरम घास।
निर्झर,सरिता के आसपास।।
रजनी भर रो रो कर चकोर
कर देता है रे रोज भोर,
नाचा करतें हैं जहाँ मोर

,है जहाँ वल्लरी का बन्धन
बन्धन क्या,वह तो आलिंगन,
आलिंगन भीचिर आलिंगन ।
बुझती पथिकों की जहाँ प्यास
निद्रा लग जाती अनायास,
है वहीं सदा इसका निवास।।

    ~कवि गोपाल सिंह ‘नेपाली’

शब्दार्थ-

कानन-जंगल , वसुधा-पृथ्वी , तमाल-एक सदाबहार पेड़ , कटीले-कांटेदार झाड़ी , मृणाल-कमल की कोमल डंठल , मराल-हंस , पावस-वर्षा , मंजुल-सुंदर/मनोहर , विह्वल-वियग्र , विलोक-देखना , निर्झर-झरना , निर्झरिणी-नदी/सरिता , रजनी-रात , वल्लरी-लता , अस्तांचल-सूर्यास्त

Nature Poem in hindi

hindi poem on nature

सुबह

सूरज की किरणें आती हैं,
सारी कलियाँ खिल जाती हैं,
अंधकार सब खो जाता है,
सब जग सुंदर हो जाता है।

चिड़ियाँ गाती हैं मिलजुल कर,
बहते हैं उनके मीठे स्वर,
ठंडी ढंडी हवा सुहानी,
चलती है जैसे मस्तानी।

ये प्रातः की सुख­बेला है,
धरती का सुख अलबेला है,
नई ताज़गी नई कहानी,
नया जोश पाते हैं प्राणी।

खो देते हैं आलस सारा,
और काम लगता है प्यारा,
सुबह भली लगती उनको,
मेहनत प्यारी लगती जिनको।

मेहनता सबसे अच्छा गुण है,
आलस बहुत बड़ा दुर्गुण है,
अगर सुबह भी अलसा जाए,
तो क्या जग सुंदर हो पाए।

~ श्री प्रसाद

Kids Poem in hindi about nature

नन्ही चिड़िया

सुबह सवेरे बोल रही है
चिड़िया प्यारी प्यारी,
छोटी है पर बड़ी देर तक
रखे बोलना जारी।

नहीं थकन होती है इसको
इसमें कितनी ऊर्जा,
चंचलता से भरा हुआ है
इसका पुर्जा पुर्जा।

दिन भर उड़ती इधर-उधर यह
चाहे भूखी प्यासी,
किन्तु आँख में इसकी दिखती
तिलभर नहीं उदासी।
बिना शिकायत के सहती

 यह ऋतुओं का परिवर्तन,
बारह मास खिला रहता है
फूल बना इसका मन।

अपने कामों में ही रहती
रात दिवस यह खोई,
नहीं ध्यान देती है उसपर
क्या करता है कोई।

सुन्दर पंखों वाली चिड़िया
कोमल भोली भाली,
जब भी देखूँ इसे झूमती
मेरे मन की डाली।

– सुरेश चन्द्र “सर्वहारा”

Poem in hindi nature

पत्तियों का चिड़ियाघर

पेड़ों के कपड़े हैं पत्ते

पेड उन्हीं को पहने रहते

पेड़ों के बस्ते में होते

खेल खिलौने सस्ते सस्ते।

पत्तों का भी है संसार

पत्तों के हैं कई प्रकार

हर पत्तों का है आकार

केले, बरगद और अनार।

पत्तों को छू कर तो देखो

उनसे हाथ मिलाओ तुम

हंसी खेल में बातचीत में

उनको मित्र बनाओ तुम।

अखबारों की तह के भीतर

उनको नींद सुलाओ तुम

अगर नींद से जाग उठे तो

गुनगुन गीत सुनाओ तुम

इन सूखे पत्तों से खेलो

मिलकर उन्हें सजाओ तुम

यह सारे दिलचस्प नमूने

कागज पर चिपकाओ तुम।

पिपल पेट , पूँछ डंडी की

पैर कनेर के, इमली की नाक

हरी घास की लंबी मूछ

कहीं बबूल, कहीं पर ढाक।

होते ना पत्ते बेजान

उनकी होती खास जुबान

कोई पत्ता लगता चेहरा

कोई है चोटी की शान।

पेड़ों के पत्तों से बच्चों

बनता सुंदर चिड़ियाघर

सैर करो तुम आज उसी की

जल्दी आओ करो सफर

~अरविंद गुप्ता

Kids hindi poem on nature

लघु सरिता

यह लघु सरिता का बहता जल,
कितना शीतल कितना निर्मल|

हिमगिरि के हिम से निकल निकल,
यह विमल दूध-सा हिम का जल|

रखता है तन में इतना बल,
यह लघु सरिता का बहता जल|

निर्मल जल की यह तेज धार,
करके कितनी शृंखला पार|

बहती रहती है लगातार,
गिरती उठती है बार-बार|

करता है जंगल में मंगल,
यह लघु सरिता का बहता जल|

कितना कोमल कितना वत्सल,
रे जननी का यह अंतस्तल|

जिसका यह शीतल करुणा जल,
बहता रहता युग-युग अविरल|

गंगा-यमुना, सरयू निर्मल,
यह लघु सरिता का बहता जल|

~कवि गोपाल सिंह ‘नेपाली’

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